Rajendraprasad Vyas
B.Sc.(maths)M.A(sanskrit)jyotishachar ya(m.s.u.)PalmistVastushastri. A FRIEND-PHILOSOPHER AND GUIDE deojyotishalaya,6 sahajanand soc.,harani-varsiya ring rd,vadodara 390006(india) mail:deojyotishalaya@gmail.com (inUSA 404 806 1794) phone:+91-9376214921 (R) 0265-2480419
मंगलवार, 6 मार्च 2012
रविवार, 25 सितम्बर 2011
जड़ या जीवन ! गति तो रहती ही है !!
कर्म तो पैदा होते ही रहते है ! ऐसा नहीं की जीवित में !! हमें जो निर्जीव दिखाते है उनमे भी रहे अ णु में न्यू ट्रोंन प्रोटोन है !! नुक्लिअस को केंद्र में रखे हुए पृथ्वी की भाती इलेट्रोंन घूम रहे है !! उसमे भी गति है उसके भी कर्म है या परिवर्तन है !! अवकाशी घटना ये हम नहीं घटाते है !! ये कौन कलाकार है ? विज्ञानं से अज्ञान में ज्यादा अभिमान हम कर बैठते है !!
मान लो के चलते बिचमे कोई पत्थर आया हम उसको छोड़ के चल दिए !! तो कोई तो उसे खिसकाए गा ही !! अरे मौसम उसे बदलेगा !!
जैसे पत्थर समाधिस्थ चैतन्य है हम हिलते चलते चैतन्य है !!अगर कोई मनुष्य या प्राणी उस पत्थर को इधर उधर करता है तो ये भी समजा जायेगा की समाधिस्थ की क्रियाओ के लिए ये जीवित आत्मा था !! उदाहरन में कीड़ी -मंकोड़ो जंतु ओ भी प्रकृति के परिवर्तन में सहभागी होते रहे है !! प्रकृति के परिवर्तन में जैसे जंतु है वैसे मनुष्य भी एक जंतु ही है !! ऐसा नहीं लगता के काबा - मूर्ति- शिवलिंग के दर्शन में कोई महात्म्य का रहस्य हो !! जड़ या जीवन ! गति तो रहती ही है !!
शुक्रवार, 23 सितम्बर 2011
क्यों होता है यह राग भंग ?
हमारी इच्छाओ के अनुसार ही हो जाये !!!यह तो जुआरी जैसी बात बन गई !! यहाँ तो केवल राजा रानी या तो किंग क्रोस का सिक्का उछल कर नंबर देखना होगा | हम जो चाहे है वैसा नहीं होता है तो हम दुखी हो जाते है ,गुस्सा करते है !!बस प्रतिकुलताये हमें पसंद ही नहीं !! अरे ध्यान से देखो - यह अनुकूलता का भी लय बध्ध ताल ही है | जब अनुकूल पवन चलता है तब हमारा सभी कम बड़ी आसानी से होता रहता है . जिसका हमें आनंद होता है . यह राग अच्छा लगता है . किन्तु जो प्रतिकूल होता है तब कोई काम सीधा नहीं होता यह अराग है !! जो हमें पसंद नहीं है . कौन करता है यह सब ? यही तो प्रकृति की माया है !! ऋतू ओ की मज़ा लेते है अबुध पशु पंखी !! मनुष्य तो अबुध नहीं है न !!! बहार से आता है यह ! ये हमारी इच्छा नहीं है | अरे क्यों छेड़े जाते है ऐसे राग भंग वाले गीत !!! अरे यह राग को कौन तोड़ देता है !!यह राग भंग के समय करे भी क्या ? क्यों होता है यह राग भंग ?
बस यहाँ से ही पैदा हुआ है वितराग !! जहा राग बार बार आकर मोहित करता रहेता है !! इसी लिए राग को छोड़ कर कर ध्यान का महत्व बना !! अवरोध स्थिति में ध्यान औषध बनता है !! बेध्यान होने से दर्द का भूलना है शायद !!शराबी जैसे भले मेरे देह को नुकसान हो पी लेता है वो !!! यहाँ देखेंगे की बहार के ही तत्वों काम कर रहे है !! प्रकृति माता उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करवाती है !! हम स्वयं भूल जाते है की हम तो प्रकृति के भाग अंश है !!
जब एक के बाद एक प्लानिंग नष्ट होते जाते है तब यह वितराग वाली बात समज में आती है !! यही मुनि यो की फिलोसोफी है !!
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