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January 23, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

what to do????क्या करे !

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जीवनमे तो फिर करे क्या? किसको माने? और क्यो? क्या बनना है ? अर्थ क्या है ? अरे ये जीवन शुन्य है क्या? इसका कोई अर्थ तो होगा न ?वगैरह जिग्न्यासा आवेग के प्रश्न है !जिसको दो रोटी का प्रश्न है या तो जिन्दा रहने का प्रश्न है या किसी सांसारिक उल्जनोमे फंसा हुआ है उन लोगोको यह अध्यात्मिक बीमारी का सवाल ही नही उठता !मतलब जो खुदको इसी सांसारिक उल्जनोसे भर नही निकल सकता उन लोगोके लिए आध्यात्मिकता केवल अक बचाव प्रयुक्ती से ज्यादा कुछ नही है !वास्तवमे ही जो फ़कीर है खाना पाने को भटक रहा है वो बुध्ध नही है संसारमे फ़ैल हुआ इन्सान है । जिसिको धर्मवाले राजकारण वाले शिक्षण बेचने वालो ने भुए आसानीसे लूटा है!! इसीलिए अपने आपको पहले शारीरिक सुखी जिवात्मतो बनाओ !!जो ख़ुद अपने को सुखी नही कर सकता है वो दुस्रोको भला कैसे कर सकेगा? जिसने राज महेलो और सुख वैभव सब होते हुए भी त्याग दिया है वो वर्धमान महावीर बनता है !तू अगर सन्यासी है तो यहाँ गृहस्थोके बिचमे भीख क्यो मागता है !आश्रमों बनाना सम्पति इक्कठी करना किर्तिके पीछे भटकने की बीमारी लोभ मोह नही तो है क्या?अगर तू वहा परम शत स्थितिमे है तो यह अशांति …