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September 25, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जड़ या जीवन ! गति तो रहती ही है !!

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कर्म तो पैदा होते ही रहते है ! ऐसा नहीं की जीवित में !! हमें जो निर्जीव दिखाते है उनमे भी रहे  अ णु में न्यू ट्रोंन  प्रोटोन है !!अरे इसीके अन्दर भी और अणु  मिलते ही जायेंगे !! जड़ ता कहासे शुरू हुई !!! अवकाश से वायु !! वायु से अग्नि !! अग्नि से जल !! जल से पृथ्वी तत्व !! अवकाश और जड़ता के अनु का प्रारंभ कहा कब हुआ ??
 नुक्लिअस को केंद्र में रखे हुए पृथ्वी की भाती इलेट्रोंन  घूम रहे है !! उसमे भी गति है उसके भी कर्म है या परिवर्तन है !! अवकाशी घटना ये हम नहीं घटाते है !! ये कौन कलाकार है ? विज्ञानं से अज्ञान में ज्यादा अभिमान हम कर बैठते है !!  मान लो के चलते बिचमे कोई पत्थर आया हम उसको छोड़ के चल दिए !! तो कोई तो उसे खिसकाए गा ही !! अरे मौसम उसे बदलेगा !!     जैसे पत्थर समाधिस्थ चैतन्य है हम हिलते चलते चैतन्य है !!अगर कोई मनुष्य या प्राणी उस पत्थर को इधर उधर करता है तो ये भी समजा जायेगा की समाधिस्थ की क्रियाओ के लिए ये जीवित आत्मा था !! उदाहरन में कीड़ी -मंकोड़ो जंतु ओ भी प्रकृति के परिवर्तन में सहभागी होते रहे है !! प्रकृति के परिवर्तन में जैसे जंतु है वैसे मनुष्य भी एक जंतु ही है …