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December 5, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सत्वादी

समष्टि में सत्व केन्द्रमे है.उसीके अन्दर तो और भी गहन सोलिड सत्व है ! बहार रजः है.यही रजः गति भी है !और गति से ही तो संसार है। इसीलिए गति के कारण थक जाने से पैदा होता है तमः !! जो जरुरी आराम भी है । किंतु यहाँ ही पैदा होते है वैभव विलास बेखबरी नही जिम्मेदार मानस !!किंतु अगर मूल से देखेंगे की यह पैदा हुआ है तो रजः के कारण से ही !! वैसे रजः गुन तो तमो गुनकी माँ बन गया !!!!यही माँ वो माया है !!.अब देख सकते है की अगर माया को जिन्दा रखना है तो रजः को जिन्दा रखना है याने की गति को !! सर टी आईटीआई संसार : जो चलता है वोही जीवन है !!किंतु यह गति ई कहा से ??? गति का कारण तो सत्व ही है ! ये तो सत्व के प्रकाश है !! इसीलिए माया को सत्व को पलानाही पड़ता है !! सत्व तो तो मूल अत्मताव्से उठाया हुआ है माया का !!यही तो भक्ति है आसुरी !! इनको जरुर नही है सत्व की लेकिन जिन्दा रहना है इसीलिए सत्व को बचाना जरुरी बन जाता है !इसीलिए प्रगाढ़ अन्धकार में ही सत्व की वेल्यु हो ही जाती है !!! जो चारो दिशामे व्याप्त है वोही तो कलियुग है किंतु कलियुग में रह्राहे परमात्मा की ये अकल लीला कृपा है !!! की सत्व गुन को …