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September 10, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ध्यान तो जगत के प्रहारों से बचने की युक्ति है

वैसे देखने जाये तो ज्ञान वो तो जगत पर होता प्रहार है !! ध्यान तो जगत के प्रहारों से बचने की युक्ति है !! वैसे साधुत्व के संग्राहक और संशोधक दो रूप है | कर्म अकरम से बड़ा है !! किन्तु
ज्ञान + कर्म = ज्ञान +अकर्म  इसीका कर्ण यह है की ज्ञान अनंत है !! थक जाये के सब जानते जानते !!   हवा खुद मेरे  कमरे में चली आती है !! सूर्य खुद मेरे कमरे में आता है !! प्रभु उसी तरह खुद मिलने को आते है !! सिर्फ मुझे मेरा कमरा खुला रखना है !!

श्राध्ध का रहस्य

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श्राध्ध का रहस्य ---
अगर अगर आप किसीभी पौधे से डाली तोड़ कर गाड देते है तो  वहा भी नया पौधा विकसित होता है .  वैसे मानलो के आपके पास एक गुलाबका पौधा है ! अब उसी की एक डाली गाड तो वहा नया पौधा विकसित होगा उस पर भी नए फुल खिलेंगे !! अब कुछ समय बीत जाने पर पुराने वाला पौधा नष्ट हो गया !! लेकिन पुराने वाले पौधे का जीवित भाग डाली नये पौधे में आज भी जिन्दा है !! मतलब पुराना जो मर गया वो फिजिकली पूरा नहीं मरा 
था !! आज भी वो अपना जिन्दा भाग छोड़ कर गया है !! इस नये पौधे को पानी दिया वो पुराने वालेके जिन्दा भाग  को भी है !! बस यही बात श्राध्ध में है !!! मेरा पिता के श्राध्धके दिन मै मेरे भाई को दूध पाक खिलाता हु तो क्या ये मेरे पिता को नहीं पहुचेगा ??