संदेश

March 29, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुर्वयोजन की आदत

इच्छा हो उसी तरह कही कम बन जाए ऐसा तो जुआ में कभी कभी हो जाता है । लेकिन अगर ये सोचे तो यह तो एक सिक्का उछल ने से राजा या रानी ऐसा ही होता है ! किंतु इसमे हमारी इच्छा के बरोबर होता है तब आनंद होता है !!और जब नही होता तब दुःख -क्लेश पीडा होती है !!गुस्सा और आवेग भी बढ़ जाता है !!
जब राग माय होते है या उस राग में खोये हुए होते है तब अचानक तकलीफ आ गिरती है तब विपरीत राग कहते है। अर्थात हमारी इच्छा से विपरीत ताल बध्ध नही है । यह न बुलाई बात ने राग के ले को तोडा है ! ऐसा बार बार होने से दुःख होता है !
बस इसी चक्कर से भी बार बार जन्म लेने से होता होगा वीतराग ! जहा बार बार राग सामने से आकार मोह पीडा करता है !
इन सब बातो में देखे तो बहार से ही प्रश्न आते है !बोलते है ने की ग्रह पीडा हुई !!प्रकृति माता उसकी इच्छा के अनुसार कम कराती है ! हम सब यही भूल जाते है की हम ख़ुद प्रकृति का भाग ही है !
आपके प्लानिंग एक के बाद एक नष्ट होते जाते है !! तो क्या ये प्लानिंग करने की आदत ग़लत है क्या ??
इसीलिए तुलसी ने शायद कहा है
प्रारब्ध पहले बना पीछे बना शरीर । तुलसी यह मन जान के धारण करले धीर ।