संदेश

April 26, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Rajendraprasad Vyas: उपनिषद् मे

चित्र
उपनिषद् में बहोत सी बाते कही गई है !! उसमे प्रभु के बारे में यमेवैष .... में जो वरन शब्द का प्रयोजन किया है उसका मै ऐसा अर्थ निकलता हु जो योग्य है । वरण का जो अर्थ जानना है तो कर्मकांड पूजा में ब्राह्मण पंडित कार्यो को बाट लेते है । जैसे आचार्य ब्रह्मा जप करता होता वगैरह !! इसी भाती हमें भी अपने प्रभु का वरण करना होता है !! इश्वरकी कल्पना मनुष्य की सबसे बड़ी उडान है !! तत्व चिंतको ने की बड़ी सेवा है । धर्मो सम्प्रदायों के मूल में यही तो चिंतन है !!




आत्मा - किरण परमात्मा की

चित्र
आत्मा को समजने के लिए सरल उपाय यह है की एक ही बिजलीके गोले निकलता प्रकाश ! यह प्रकाश की किरणे ही आत्मा तत्त्व है ! जो अनादि सतत प्रकाश फैलता हुआ !!जीवन्तता !!जैसे हरेक किरण आत्मा !! सब का आना एक ही जगा से !! हम सबका मूल एक ही है किन्तु अपनी अपनी दिशा है !! किरणों से भी निकलती किरणे !!! चारो और फ़ैल जायेगा !! उस महान क्षण ध्यान कहो या कयामत !!!लेकिन हमारे लिए एक गौरव की बात है की हम उसकी किरण है !!! इसीलिए हम देह या मन नहीं है !! आत्मा है हम । प्रभु के अंश !!जीवन प्रकाश है ! मृत्यु अप्रकाश है ! देह(प्रकृति)की गति है। सद्गुण द्वारा आत्म मिलन के लिए दौड़ रही है .दुर्गुणों की पराकाष्ठ होने पर जड़त्व है । देह की यह प्रकाशित गति है।
इसी खेल के कारण हम सब का मूल एक ही होते हुए भी संसार में भिन्न भिन्न लगते है !! हा मूल एक है  लेकिन दिशा अलग है !! एक मज़ा का शब्द जो मिलता है वो है अनेकान्त !! और गीत रामायण की मराठी में यह पंक्ति बड़ी सुन्दर लगाती है जो यहाँ अप्रोप्रिएट बैठती है " तुजे आणि मज्या आहे वेगळा प्रवास "…  कौन किसीके साथ मरके जाता है !!