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सितंबर 14, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विभूति ज्ञान

विभूति भासित भस्म क्षार रक्षा यह पञ्च भस्म है ऐश्वर्या के कारण से विभूति प्रकाश करने से भासित सर्व पाप के भक्षण से भस्म आपत्ति यो का क्षय करने से क्षार भुत प्रेत पिशाचादी संसार भय से रक्षण करने से रक्षा तापादी आधिदेइविक अधिभौतिक अध्यात्मिक तिन ताप त्वचा,मम्स ,रक्त,अस्थि,स्नायु,मज्जा छे कोष उपजना,होना, बढ़ाना, परिणाम होना,कम होना ,विनाश यह छ विकार भाव भूख तरस शोक मोह जरा मरण यह छ उर्मिया कुल जाती वर्ना गोत्र आश्रम रूप यह छ भ्रांति योग की कुछ बाते हत्पद्म की ८ पंखडी है . जिव जब पूर्व में होता है तब पुण्य में मति रहती है. जब अग्नि कोण में रहता है तब निद्रा आलस्य क्रोध और मूर्छा होती है. पश्व्हीम में क्रीडा करने की बुध्धि होती है . वायव्य में देशांतर में जाने की इच्छा होती है. उत्तर में विषय में प्रीटी होती है. इशान में द्रव्य लोभ और कमल के मध्य में वैराग्य विषयमे जाता है . ------------------- प्राणवायु को नासाग्र में धारण करने से प्राण का जय होता है. नाभिके मध्यमे धारण करने से सर्व रोग की निवृत्ति,पाव के अंगुष्ठ में निरोध करनेसे लघुता होती है. जो जिव्हा से वायु को पिता है वह श

दर्भ की विशेषता

संध्या पूजा में दर्भ ,कामला या रेशमी वस्त्र का आसनप्रमाण भूत कहा है !दर्भासन पर बैठने से विज भय नहीं रहता! प्रमंभुत आचार्य दर्भापवित्रपानी: शुचौ अवकाशे प्रन्ग्मुख उपविश्य महता प्रयत्नेन सुत्रानी प्रनायती सम । (महाभाष्य १ - १ -१ ) यहाँ श्री पाणिनि का पूर्वाभिमुख बैठना और दर्भ की अंगूठी से पवित्र हाथ की बात का वर्णन है । दर्भो य उग्र औषधि: तम ते बध्नामि आयुषे । (अथार्ववेदा १९ -३२-१ ) अर्थात दर्भा धारण करने से औषधि जेइसा प्रभाव और आयुष्य वृध्धि होती है !! त्वं भुमिमात्येशी ओजसा , तवं वेध्यं सीदसि चरुध्वारे । तवं पवित्रमृश्यो भरन्त तवं पुनिही दुरितानि अस्मत ॥ (अथर्व १९ - ३३-३ ) इस दर्भा में पाप दूर करनेका सामर्थ्य है । इसी लिए तो यज्ञ एवं पितृ पूजा और ग्राहनादी दोष से बचने में प्रयोग होते है !!इसकी दर्भ याने कुशमुद्रिका का प्राधान्य भी है ! य वाई वृत्रद बिभ्त्समाना अपो धन्वाद्भंत्य उदयन, ते दर्भा अभूवन । ...(७-२-३-२ ) इसीका उपाय के रूप में भी उपयोग हो सकता है !! केतु के होम में ज्योतिष में दर्भ का उपयोग कहा है !! केतु के निमित्त कुश की समिधा का प्रधान है शनि राहू केत