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October 7, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या करे

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कुछ ऐसे ही उल्जे रहते है ! क्यो की उन्हें प्रश्न है किसको माने ! भगवान वाले, धरम वाले सबने जैसे अपनी अपनी दुकाने खोले रख्खी है ! किसका मॉल क्या है ??
इसके पछे बड़े आराम से धर्म एक उद्योग बन गया है इसकी बू युही नजर आ जाती है !! शास्त्रों ने अगर कोई ग्रुप ही रखना था तो जन्म के समय हाथ में कुछ दे के रख्खा होता ! लेकिन एक ये भी चीज़ है की हरेक धर्म के मूल में रह रहे लोग की मुराद उम्मीद बहोत है ये लोग बहोत कुछ कहना चाहते है !! इसीलिए तो बहोत से ग्रन्थ बने है ! लेकिन इसीके व्यावसायिक अर्थ तो अर्थ लक्सी निकलते ए है ! सायंस बहोत कुछ कर सकता है लेकिन इसीके पीछे राजकीय लोग और व्यवसाय लगे रहे है ! विज्ञानं और अध्यात्म का संगम पर खडे होकर मैंने ज्योतिष का शिक्षण लेने का मजा देखा तो अदभुत है ! यहाँ कुछ सोचे !अगर आप परमात्मा होते तो यह नही होता इसी लिए क्या करना है तो परमात्मा बनने की कोशिश करे अगर नही हो सकता है तो .....
इसी बात को सरलता से समजने के लिए यह प्रारंभिक भाग समज में आयेगा !