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August 14, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तेरी मेरी प्रीत पुरानी ....

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प्रभु एक बच्चे को बोध कर रहे है । ऐसी एक पुरानी फ़िल्म सन ऑफ़ इंडिया की जो याद है ...

तेरी मेरी प्रीत पुरानी जन्मो जनम का मेल
मन तोरा मन्दिर है मेरा तू है दिया मै तेल
यहाँ कविकी कल्पना है की अगर जो प्रभु होते तो ये कहते
इस दुनिया को चलने वाले जो कोई भी शक्ति है उसे धर्मोने अलग अलग नाम दे कर पुकारा है। मनुष्य को चाहिए की उसी शक्ति को मानकर चले । बिन्सम्प्रदयिकता का अर्थ ये नही होता की उस शक्ती को नही मानना । आजकल धर्मो और राजकारण ने पूर्ण धंधा का रूप ले लिया । इसलिए इन लोगोके पास ग्राहकको और वोटर्स को सम्हाले रखना ध्येय मुख्य है !!बाकी  अमरीका के  डालर में हम भगवान में विस्वास करते है ऐसा छापा हुआ है !!ये बात से इश्वर है की नही यह बेकारकी बहससे सामान्य लोग बच तो जाते है ! और वो दोनों चालक धन्धादारियोमें फंसते तो बचते रहते !!







महाजनों ने केवल दुःख ही लिया है !!

परमात्मा की यह अदभुत दौड़ तो देखो !प्रकृति स्वयं ख़ुद उनकी ही है क्यो ?क्यो दौड़ रही है ? क्यो भविष्य काल बना ?क्यो उस तरफ़ दौडी और भूतकाल की रचना कर डाली ?भूतकाल के अस्तित्व का ज्ञान कराया ? क्या जरुर थी इस सबकी ? क्या पहेले था व…