तेरी मेरी प्रीत पुरानी ....


प्रभु एक बच्चे को बोध कर रहे है । ऐसी एक पुरानी फ़िल्म सन ऑफ़ इंडिया की जो याद है ...

तेरी मेरी प्रीत पुरानी जन्मो जनम का मेल

मन तोरा मन्दिर है मेरा तू है दिया मै तेल

यहाँ कविकी कल्पना है की अगर जो प्रभु होते तो ये कहते

इस दुनिया को चलने वाले जो कोई भी शक्ति है उसे धर्मोने अलग अलग नाम दे कर पुकारा है। मनुष्य को चाहिए की उसी शक्ति को मानकर चले । बिन्सम्प्रदयिकता का अर्थ ये नही होता की उस शक्ती को नही मानना । आजकल धर्मो और राजकारण ने पूर्ण धंधा का रूप ले लिया । इसलिए इन लोगोके पास ग्राहकको और वोटर्स को सम्हाले रखना ध्येय मुख्य है !!बाकी  अमरीका के  डालर में हम भगवान में विस्वास करते है ऐसा छापा हुआ है !!ये बात से इश्वर है की नही यह बेकारकी बहससे सामान्य लोग बच तो जाते है ! और वो दोनों चालक धन्धादारियोमें फंसते तो बचते रहते !!







महाजनों ने केवल दुःख ही लिया है !!

परमात्मा की यह अदभुत दौड़ तो देखो !प्रकृति स्वयं ख़ुद उनकी ही है क्यो ?क्यो दौड़ रही है ? क्यो भविष्य काल बना ?क्यो उस तरफ़ दौडी और भूतकाल की रचना कर डाली ?भूतकाल के अस्तित्व का ज्ञान कराया ? क्या जरुर थी इस सबकी ? क्या पहेले था वो ठीक नही था क्या ? क्या प्रभु दुखी था क्या? अगर वो दुखी था तो वो प्रभु है ही नही ! इसीलिए यही निष्कर्ष होगा की वो ख़ुद ही दुःख की और दौड़ा है ?

इसीलिए याद रहे आगे दुःख है ! सुख तो तुम्हारे पास था ही !!और ऐसा भी कहा है जो है उसीको सम्हालना तो शिखो !भविष्य ज्योतिष दृष्टी से आकर्षण शुक्र का दिखता है !जो सुख है वो तो वस्तुतः दुःख ही है !!अरे जिसिको तू दुःख समाज बैठा है वो तो सुख है !!

राम इसु बुध्ध वगैरह किसीको भी देखो ,उन लोको ने दुन्वयी दुःख का ही भोग किया है !किंतु उसी दुखोने उनको भगवान बना दिया है !! उन लोगोको अपनी समाज से जब दुनियाई सुख की जरुरत थी तब उनको वह नही मिला है !! और जब जरुरी नही था तब पीछे से उन्हें सुख मिला है !अर्थात अब उन्हें इसीका कोई रस नही रहा है!! जिसका भाषांतर हम त्याग वैराग्य में करते है !!

भटक कर पड़े रहजनों के जो हाथो । लुटे इस कदर रहनुमा हो गए हम ।

बस इसी शायरी जैसा हल होता है । लूटेरे जैसा यह जगत के हाथो भटकता हो गया !! ऐसा तो लूट लिया है जगत ने के दूसरो को इसी रास्तेसे बचने को बताता हुआ पथ दर्शक बन गया हु ।



ये सब जानने से क्या फायदा है ?

मान लो की आप एक रस्सी को साँप मान के डर डर के जी रहे है ! अगर आप को ज्ञान हो जाए की यह साँप नही मगर रस्सी है तो क्या शान्ति नही मिलेगी ? विस्वास और श्रध्दा से जीने की मजा कोई और है !! अगर मन ले के आप को यह रस्सी है ऐसा मालूम है तो यह प्रश्न ही नही उठता !


अपने मत का ममत रखके धर्मो और सम्प्रदायों पैदा होते रहे है इसीका भी यह एक कारण है !! जिनको शोध ही नही करना है वो किसीकी भी गाड़ी में बैठ के जुआ खेल लेते है !इसीलिए अध्यात्म वाद भी एक अपना रूप रख्खे हुए है !!
जानते है न एस्ट्रल बॉडी !! आप तो समस्त विश्व के केंद्र में है !!

टिप्पणियाँ

RAJENDRAPRASAD VYAS ने कहा…
मूलतः ज्यौतिश्शास्त्रका सम्बन्ध आध्यात्म से है.कारण यह है की वेड केलं समयसे है.मूल कृषि कार्यो एवं यज्ञ कर्योमे पुण्यअर्ह समय तय करना था ।वेदोमेभी ज्योतिष नाक्सात्रोकी बात है । इन्द्रादि देवोकी बात है। प्रकृति यज्ञ खेतीबाड़ी की बात है । अच्छा समय तय करना हवामान को समजना यह सब जरूरी था । इसमेसी पीडा हुआ है मूहूर्त शास्त्र !पुन्याह्की बात !

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