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सत्वादी

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समष्टि में सत्व केन्द्रमे है.उसीके अन्दर तो और भी गहन सोलिड सत्व है ! बहार रजः है.यही रजः गति भी है !और गति से ही तो संसार है। इसीलिए गति के कारण थक जाने से पैदा होता है तमः !! जो जरुरी आराम भी है । किंतु यहाँ ही पैदा होते है वैभव विलास बेखबरी नही जिम्मेदार मानस !!किंतु अगर मूल से देखेंगे की यह पैदा हुआ है तो रजः के कारण से ही !! वैसे रजः गुन तो तमो गुनकी माँ बन गया !!!!यही माँ वो माया है !!.अब देख सकते है की अगर माया को जिन्दा रखना है तो रजः को जिन्दा रखना है याने की गति को !! सर टी आईटीआई संसार : जो चलता है वोही जीवन है !!किंतु यह गति ई कहा से ??? गति का कारण तो सत्व ही है ! ये तो सत्व के प्रकाश है !! इसीलिए माया को सत्व को पलानाही पड़ता है !! सत्व तो तो मूल अत्मताव्से उठाया हुआ है माया का !!यही तो भक्ति है आसुरी !! इनको जरुर नही है सत्व की लेकिन जिन्दा रहना है इसीलिए सत्व को बचाना जरुरी बन जाता है !इसीलिए प्रगाढ़ अन्धकार में ही सत्व की वेल्यु हो ही जाती है !!! जो चारो दिशामे व्याप्त है वोही तो कलियुग है किंतु कलियुग में रह्राहे परमात्मा की ये अकल लीला कृपा है !!! की सत्व गुन को म...

क्या करे

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कुछ ऐसे ही उल्जे रहते है ! क्यो की उन्हें प्रश्न है किसको माने ! भगवान वाले, धरम वाले सबने जैसे अपनी अपनी दुकाने खोले रख्खी है ! किसका मॉल क्या है ?? इसके पछे बड़े आराम से धर्म एक उद्योग बन गया है इसकी बू युही नजर आ जाती है !! शास्त्रों ने अगर कोई ग्रुप ही रखना था तो जन्म के समय हाथ में कुछ दे के रख्खा होता ! लेकिन एक ये भी चीज़ है की हरेक धर्म के मूल में रह रहे लोग की मुराद उम्मीद बहोत है ये लोग बहोत कुछ कहना चाहते है !! इसीलिए तो बहोत से ग्रन्थ बने है ! लेकिन इसीके व्यावसायिक अर्थ तो अर्थ लक्सी निकलते ए है ! सायंस बहोत कुछ कर सकता है लेकिन इसीके पीछे राजकीय लोग और व्यवसाय लगे रहे है ! विज्ञानं और अध्यात्म का संगम पर खडे होकर मैंने ज्योतिष का शिक्षण लेने का मजा देखा तो अदभुत है ! यहाँ कुछ सोचे !अगर आप परमात्मा होते तो यह नही होता इसी लिए क्या करना है तो परमात्मा बनने की कोशिश करे अगर नही हो सकता है तो ..... इसी बात को सरलता से समजने के लिए यह प्रारंभिक भाग समज में आयेगा !

स्वच्छता को लाना होगा !

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हम जब विदेश जाते है तो गाँधी की स्वच्छता की बात जरुर सामने आयेगी ! कई विदेश से आने वालो को भारत में गुमना फिरना पसंद है किंतु पिशाब संडास की व्यवस्था कोई करते नही है ! अरे मुंबई में तो रेल की पटरियों पे कई लोग हाजत के लिए बैठे हम देख सकते है !! कूदो को गंदे की निकल व्यव्यस्था न होने के कारण लोग इधर उधर कचरा फैकते रहते है ! स्वच्छता को लाना होगा ! गाँधी के बाद कोई भी नेता ने इसी को प्राधान्य नही दिया है !!! मैंने देखा आज कल होशियार लोगो ने स्वच्छता को कीमती बना दिया है और इसीका वेपार  के भाग रुप  होने लगा है !!लारी पर अच्छी चाय मिलने पर भी फाइव स्टार होटल वाले देखे !! स्वच्छता की कीमत जुड़ जाती है !! ऐसा नहीं की भारत में भी कई जगह स्वच्छता विदेशो से कम नहीं लगतीहै !! कई शादी विवाह पार्टिया देखो !! रामोजी हैदरबाद में देखो !! मोदीजी का स्वच्छता अभियान की सोच एक बात से आशा वाद खड़ा करती है !! महात्मा गांधी आज भी जिन्दा है !! गांधीजी की बात विनोबाजी अवं सर्वोदय के कार्य कर में देखि जाती थी।  आज इतने सालो बात चलो कोई तो पि एम आया जिसने गांधी की एक बात को दोहराया है !...

मन

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मन एक अद्भुत चीज़ है । कुछ लोगोने मन के बारे में कई जानकारी दी है । ज्योतिष ने इसे जोड़ा है चंद्र से ! चन्द्रमा मनसो जातः । रमण महर्षि ने मन को चोर कहा है । ये पकड़ा नही जाता ! ज्योतिषशास्त्र में मन को चंद्र के साथ जोड़ा है। पंच  भूत मंगल बुध गुरु शुक्र शनि जो है वह अग्नि भूमि आकाश जल और वायु है । आत्मा मन है राहू केतु ग्रह नही है । अवरोध और गति की रिधम  न्यारी है ! अवरोध राग जगाये तोहे  हं यं रं वं लं मन आतमजी ब्राह्मणको मूर्ति पर प्राणप्रतिष्ठा करते हुए देखेंगे तो इन बीजो की सुनाई होगी ! कर्मकांड को कुछ बिन समज लोगोने उल्टा चित्र डाला है ! अब मानलो योग को तो यह बिज मंत्रो सुनाई देंगे । अगर आप योग  को वैज्ञानिक मानने लगे है तो कर्मकांड के भीतर भी चले जाए तो यह बात समज में आएँगी ।वास्तव में कर्मकांड वैज्ञानिक द्रष्टि से देखना जरुरी है !! कुछ धर्मं का धंधा करने वाले अत्यन्त चालाकी से अपने आश्रमों मंडलों का व्यवसाय बनाये रखने के लिए आपके अन्दर ही छिपे परमात्मा तत्त्व को विसारने के लिए कम करते रहे है और करते रहेंगे !...

सवाल के जवाब

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Visit Yahoo! Answers यहाँ कई प्रस्नोके उत्तर मैंने दिए हुए है । जिसमे फिलोसोफी की बाते है ।  फिलोसोफी से कई लोगो को सुग है । लेकिन बात ग़लत है । जीवन के तत्व ज्ञान का महत्त्व तब ही मालूम पड़ता है जब हम अकेले होते है । फानी दुनिया तो आनी जानी है !! मैंने मेरे पिताजी से यह बात जानी है की अध्यात्म चिंतन वक्त आने पर काममें लगता है । अध्यात्म जीवनमे एक बल प्रदान करता है । ज्योतिष शास्त्र में मन को चंद्र ,सूर्य को आत्मा और लग्न को शरीर कहा है । वस्तुतः इन तीनो में फंसे है हम ! आत्मा तो स्वयं प्रकाश है किंतु शरीर और मन पीछा नही छोड़ते ! देखने जाओ तो मन शरीर के बिना नही है इसीलिए जीवन का महत्व है ! यही चीज़ तो ध्यान लगाने में कम आती है । मन जाय  तो जाने दे मत जाने दे शरीर --इसे ध्यान में रक्खेगे तो ध्यान में मदद मिलती है !एक बार जैसे कर चलते वक्त ,पानी मे तैरते वक्त जिसको आता है उसे बार बार नही सोचना पड़ता है की अब पाव इधर  ले जाए या उधर ! अपने आप होती रहेती है प्रक्रिया !!अरे नींद में हमें मालूम भी नही होता है की यहाँ मच्छर बैठा हुआ है !!!और हाथ उसी दिशा मे...

ध्यान

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वैसे देखने जाए तो ध्यान एक विश्राम है !!ध्यान के समय में कुदरत को इधर उधर बिखरी हुए को जैसे योग्य स्थिति में पुनः आ जाने की अनुकूलता मिल जाती है ! प्रत्येक ध्यान के समय नया उदय =विकास करने की शक्ति मन एवं शरीर दोनों में आती है ! और ध्यान के बाद प्रथम सत्व गुन ही प्रगट होता है !इस महाकाल के नृत्य की गूंज को सुनकर जो बेध्यान बन जाता है वो ध्यानी है !!

अनुभूति

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डर से मुक्त होना है तो जो ज्ञान फेले जरुरी है वो है आत्म ज्ञान तू सत्य से भिन्न ही है ! साथ साथ अन्य के जो भी तत्व है वो तेरेमे भी है !इसीका तुजे ज्ञान है !फ़िर भी अन्य तत्व विभिन्न रीतो से पड़े हुए है !!सर्व का मूल तो एक ही है ! किन्तु यह एक और अनेक के बिच में काल - भुत है ! फिरभी काल की असर बिना का वो तत्व आज भी मौजूद है !!! किन्तु यह अनेक जो एक बने तब ही इसीकी अनुभूति हो सकती है ! जो अभी अशक्य है । इसी लिए वो जो मौजूद है उस इश्वर को जागृत कर !! या तो उसकी अनुभूति कर !!! दुनिया तो साधन है प्रभु को पूजने के लिए अद्वैत के ज्ञान बिना द्वंद का बहस होता ही रहेगा यही तो माया है !अरे तेरे और उस तत्व के बिच थोड़ा सा भी भेद नज़र अत है तब भय पैदा हो जाता है !तू ख़ुद को ही ढूंढ रहा है !! जैसा भी मन वश हो जाए तुरंत ही उसे योग्य कर्म में जोड़ देना होगा नही तो वो तुमको खा जाएगा !! कर्म तो मन को वश में रखने के लिए ही है !! और यह देह रथ को चलने के लिए !! अमन तो अदभुत कृति है प्रभु की माया की !!!प्रभु के बहोत कम होंगे वहा तक तो जीवनों के नम होंगे ही !!! इसीलिए कहते है -ज्ञानी जन्म लेता है और मरता भी ...