धर्म और श्रध्दा

धर्म का अर्थ फ़र्ज़ है । स्वधर्म का अर्थ अपना धर्मं है । स्वधर्म को समजो ब्रह्म का कुम्हारकी तरह सृष्टी बनाना और शिवजि संहारक का काम ! यह दोनों अपनी जगह है इसीलिए तो जगत चलता है । कई असुर भी महान हो गए है जैसे की प्रह्लाद, रावन, बलि वगैरह ! जैसे ये दो वार्ताए !!
एक शेरनी थी जो बहोत दिनों से जंगलमे दुस्काल होने से बच्चोके साथ भूखी मर रही थी !उसको अपने बच्चोको खिलने कोई शिकार नही मिलता था। किंतु कुछ दिनों के बाद एक भटकत हिरन आ मिला और उसके शिकार से अपना कुटुंब बच गया ! इस कहानी में हमें शेरनी की दया आती है !
दूसरी वार्ता
एक हिरनी जंगल में घुमती थी उसका बच्छा खो गया । लेकिन एक शेरनी उसको खा गई। इस कहानी में hame बच्चे को ढूँढती माँ ki दया aati है ।
बस यही चक्कर है । स्वधर्म का !
ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या रीतो पर धर्मकी मोहरे है ।
युग युग में बदलते धर्मो को कैसे आदर्श बनोगे !
संसार से भागे फिरते हो भगवान कहा तुम पाओगे !
इस लोक को ही अपना न सके
उस लोक में भी पछताओगे ! !
जैसे पानी कम आधा भरा हुआ ग्लास आधाखाली भी है आधा भरा हुआ भी है ! दोनों सही है !!
किंतु याद रहे दोनों में से एक ही दिखता है !! श्रध्दा का तो निचे चित्रही दिया है !
जिज्ञासा ओ का अंत ! विश्लेषणों का सार तू ही तू ही !!

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