कर्म की गत न्यारी

मनुष्य  की स्वतंत्रता कितनी और कहातक  ये कोई भी नहीं कह सकता  न कोई विज्ञानी न फिलोसोफेर !! गीता  में भाग्य का नाम दैव कहकर श्लोक में वर्णन  किया हुआ है !! वैसे देखने जाओ तो हमारी स्वतंत्रता प्रकृति के अधीन है !!सब अपनी अपनी प्रकृति के हिसाब से कर्म करते रहते है !! अभ्यास अनुभव लेते रहते है और उसी हिसाब से अपनी निर्णय शक्ति अनुसार कर्म किये जा रहे है !! क्यों दुष्ट के घर पैदा हुआ और क्यों धनवान के घर पैदा नहीं हुआ ?? यह सब प्रकृति की रचना के अधीन है !! कर्म का चक्कर समजना कठिन है !! भाग्य में होगा वह होगा ऐसा मान कर रहना इसीका अर्थ भी यही होता है की जो भी किये हुए कर्म है उसका जो भी फल मिलनेवाला है वह मिलेंगा !!! कर्म की गत न्यारी !!
हर एक कर्म का भी यही हाल है !! आधा  है चन्द्रमा !!!
जैसे आपको बोला एक टांग पर खड़े रहो आप खड़े हो जाएंगे ।अब कहा गया दूसरी भी टांग उठालो नही कर सकेंगे !! कारण जैसे एक टांग उठाते है वैसे दूसरी बध जाती है !!मतलब आप एक टांग उठाने को आज़ाद है लेकिन जैसे एक उठाते है दूसरी बध जाती है !! यही खेल है कुदरत का !! कुछ भी पुरुषार्थ करो किस्मत उसके साथ अपना काम कर देती है !! आप एक टांग उठाओ तो दूसरी बांध जाएंगी !!
जैसे टेबल पर से  कुछ उठाया तो दो बात बनी 1 आपने कुछ उठाया 2 आपने टेबल खाली किया !! यही है पुरुषार्थ प्रारब्ध !!
पानी पिया और प्याला खाली किया !!

टिप्पणियाँ

Kailash Sharma ने कहा…
सारगर्भित प्रस्तुति...

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ज्ञान ज्योति में राम रे