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पुर्वयोजन की आदत

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इच्छा हो उसी तरह कही कम बन जाए ऐसा तो जुआ में कभी कभी हो जाता है । लेकिन अगर ये सोचे तो यह तो एक सिक्का उछल ने से राजा या रानी ऐसा ही होता है ! किंतु इसमे हमारी इच्छा के बरोबर होता है तब आनंद होता है !!और जब नही होता तब दुःख -क्लेश पीडा होती है !!गुस्सा और आवेग भी बढ़ जाता है !! जब राग माय होते है या उस राग में खोये हुए होते है तब अचानक तकलीफ आ गिरती है तब विपरीत राग कहते है। अर्थात हमारी इच्छा से विपरीत ताल बध्ध नही है । यह न बुलाई बात ने राग के ले को तोडा है ! ऐसा बार बार होने से दुःख होता है ! बस इसी चक्कर से भी बार बार जन्म लेने से होता होगा वीतराग ! जहा बार बार राग सामने से आकार मोह पीडा करता है ! इन सब बातो में देखे तो बहार से ही प्रश्न आते है !बोलते है ने की ग्रह पीडा हुई !!प्रकृति माता उसकी इच्छा के अनुसार कम कराती है ! हम सब यही भूल जाते है की हम ख़ुद प्रकृति का भाग ही है ! आपके प्लानिंग एक के बाद एक नष्ट होते जाते है !! तो क्या ये प्लानिंग करने की आदत ग़लत है क्या ?? इसीलिए तुलसी ने शायद कहा है प्रारब्ध पहले बना पीछे बना शरीर । तुलसी यह मन जान के धारण करले धीर । काम कहा रुका ह...

पंचाग्नि विद्या

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यहाँ हम पुरूष एवं स्त्री का कुदरत द्वारा उपयोग समज सकते है । कुदरत की माया अद्भुत है ! किंतु उसका काम बिल्कुल ताल बध्ध चल रहा है केवल अहम् के कारण हम सब स्त्री पुरूष के चक्कर में जुटे है !स्त्री आकर्षण कर के या चैलेंज करके पुरूष में आवेग क्रोध या काम द्वारा करवाती है ! और पुरूष पराक्रम करने को विवश हो जाता है ! और गति मन बनता रहता है !! यद् रहे जैसे डिस्कवरी एनीमल प्लेनेट में जानवरों का उपयोग कुदरत कैसे करती है वह देखते है तब यह भूल जाते है की हम भी एक प्राणी ही है !!! और कुदरत बिल्कुल आराम से हमारा उपयोग कर रही है !यह सत्य है !! ज्योतिष शास्त्र में सुर्यादी ग्रहों के देवता और उनके तत्त्व कहे गए है !यह भी आत्मा सूर्य के देवता अग्नि एवं चंद्र मन के देवता वरुण है ! अग्नि मंगल के स्कंदा, भूमि बुध के विष्णु , अवकाश गुरु के इन्द्र ,जल शुक्र के इन्द्राणी एवं वायु शनि के ब्रह्म है !! यहाँ इन सबकी मंत्र में प्रार्थना है । इन्द्रनिश्चा स्कंदाविष्णु ब्रह्मेंद्रादी देवता । वरुनाग्नीदेवाश्चा कुर्वन्तु मम मंगलम । । पञ्च की विशिष्टता ही यही है !क्यो की वेदकालीन देवताओ ज्योतिष मुल्मे है !! आध्यात्मि...

गुन कहा से आए !!

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कुछ चीजे ऐसी है जो अपनी दृष्टी से है !जैसे की स्टार होटल में नींद आती है लेकिन सुव्वर को गंदे नाले में नींद आयेगी । वो वहा जाएगा तभी चैन आयेगा !ऐसे गुन कहा से आते है ? यह अलग प्रश्न है !तुमने कभी नशा नही किया है और अरे तुमने चखा भी नही है फ़िर भी नही करना चाहते हो यह जन्म जात गुन है ! हिरन मांसाहारी नही है किंतु शेर तो खायेगा !तो अब जगडा ये उठेगा की ऐसी दुनिया क्यो बनाई ! इसी लिए सबसे पहला सूत्र लिखा है परमात्मा रूप बन जाओ अगर यह नही तो दुसरे क्रम पर आगे बढो ! यही तो सूत्रों की कमाल है ! अपना अपना कम कैसे तय किया गया वह जानना कठिन जरुर है लेकिन गीता में स्वधर्म का उपदेश में यह समस्या का समाधान बताने की कोशिश कम नही है !! आवेगस्य शमनम स्वधर्मेंन औ गुन मंडल तू ही रस रचादे । मन गुन कर कछु गाये l शेर ने क्यों मारा !! हिरनों ने क्यों नही !!! यही बीमारी है सारी नासमजको समजने की !!!! उसीके ही सहारे बैठकर ,लिखता हु उसी के बारे में !! प्रत्येक पल देहाकृति भिन्न भिन्न होती है किंतु उसी आधार से तो उस सृष्टि का रचयिता परमात्म रूप तुम्ही साक्षी होते हो वाही उसकी खूबी है !! यह ब...

धर्म और श्रध्दा

धर्म का अर्थ फ़र्ज़ है । स्वधर्म का अर्थ अपना धर्मं है । स्वधर्म को समजो । ब्रह्म का कुम्हारकी तरह सृष्टी बनाना और शिवजि संहारक का काम ! यह दोनों अपनी जगह है इसीलिए तो जगत चलता है । कई असुर भी महान हो गए है जैसे की प्रह्लाद, रावन, बलि वगैरह ! जैसे ये दो वार्ताए !! एक शेरनी थी जो बहोत दिनों से जंगलमे दुस्काल होने से बच्चोके साथ भूखी मर रही थी !उसको अपने बच्चोको खिलने कोई शिकार नही मिलता था। किंतु कुछ दिनों के बाद एक भटकत हिरन आ मिला और उसके शिकार से अपना कुटुंब बच गया ! इस कहानी में हमें शेरनी की दया आती है ! दूसरी वार्ता एक हिरनी जंगल में घुमती थी उसका बच्छा खो गया । लेकिन एक शेरनी उसको खा गई। इस कहानी में hame बच्चे को ढूँढती माँ ki दया aati है । बस यही चक्कर है । स्वधर्म का ! ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या रीतो पर धर्मकी मोहरे है । युग युग में बदलते धर्मो को कैसे आदर्श बनोगे ! संसार से भागे फिरते हो भगवान कहा तुम पाओगे ! इस लोक को ही अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे ! ! जैसे पानी कम आधा भरा हुआ ग्लास आधाखाली भी है आधा भरा हुआ भी है ! दोनों सही है !! किंतु याद रहे दोनों में से एक...

सच ज्ञान

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ज्ञान होने से ही सुख दुःख तिरस्कार वगैरह का अनुभव होता है। जैसे की किसीके मृत्युकी ख़बर जब मिलती है तब ही दुःख होता है । जैसे की उसके मरने के दस दिन भले हुए हो ! वास्तवमे तो वो मर गया था औसके बाद के दस दिन तो तुम्हे ऑस्की कोई फिकर न थी ! अपनी ही मस्ती में जीते थे भले वो मर गया था !अर्थात ज्ञान का यहाँ महत्व है और अज्ञान के कारण न दुःख होने की बात! !समय याने की कल का महत्त्व है यहाँ पर !कौनसे समय पर ज्ञान जगत है वोही यहाँ महत्व है!अतः अज्ञान का यहाँ महत्व दिखाई देता है !गहन निद्रमे हमारे होते समय दुनिया का कोई विचार नही रहता !इसीलिए तो अज्ञान को बेचने का व्यापार चला है ! जैसे क्लोरोफोर्म-शराब-बेशुध्ध कराने वाले व्यसन वगैरह !!अब अगर देखने जाए तो ज्ञान की विस्मृति ही करता है अज्ञान !ज्ञान का नाश नही होता। जो घटना घटी है वो तो घटी ही है ! ये बदलती नही है । खली कुछ पलों के लिए तुम्हे अज्ञान से ढँक देती है ये !इसीलिए तो गीतामे कहा है अज्ञानेन वृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ती जन्तवः । हमें प्रतिकूल ज्ञान पसंद नही है केवल अनुकूल ज्ञान ही पसंद आता है !!किन्तु यह सत्य नही है । यही अध्यात्म विषय की बात ...

what to do????क्या करे !

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जीवनमे तो फिर करे क्या? किसको माने? और क्यो? क्या बनना है ? अर्थ क्या है ? अरे ये जीवन शुन्य है क्या? इसका कोई अर्थ तो होगा न ?वगैरह जिग्न्यासा आवेग के प्रश्न है !जिसको दो रोटी का प्रश्न है या तो जिन्दा रहने का प्रश्न है या किसी सांसारिक उल्जनोमे फंसा हुआ है उन लोगोको यह अध्यात्मिक बीमारी का सवाल ही नही उठता !मतलब जो खुदको इसी सांसारिक उल्जनोसे भर नही निकल सकता उन लोगोके लिए आध्यात्मिकता केवल अक बचाव प्रयुक्ती से ज्यादा कुछ नही है !वास्तवमे ही जो फ़कीर है खाना पाने को भटक रहा है वो बुध्ध नही है संसारमे फ़ैल हुआ इन्सान है । जिसिको धर्मवाले राजकारण वाले शिक्षण बेचने वालो ने भुए आसानीसे लूटा है!! इसीलिए अपने आपको पहले शारीरिक सुखी जिवात्मतो बनाओ !!जो ख़ुद अपने को सुखी नही कर सकता है वो दुस्रोको भला कैसे कर सकेगा? जिसने राज महेलो और सुख वैभव सब होते हुए भी त्याग दिया है वो वर्धमान महावीर बनता है !तू अगर सन्यासी है तो यहाँ गृहस्थोके बिचमे भीख क्यो मागता है !आश्रमों बनाना सम्पति इक्कठी करना किर्तिके पीछे भटकने की बीमारी लोभ मोह नही तो है क्या?अगर तू वहा परम शत स्थितिमे है तो यह अशांति ख...

वेदांग को समजो

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शिक्षा कल्प ज्योतिष निरुक्त व्याकरण और छंद ये सब ६ अंग वेड के कहे गये है। वेदों में जो देवताओ का वर्णन है वो सब के भी आयुष्य है। और ये सब शक्तिया अपने अपने कार्यो में रत है । मनुष्य का पंच भूतो से बना देह इन्हे समज पता है लेकिन देख नही सकता ! मनुष्य का विकास अब तक केवल पृथ्वी और थोड़ा कुछ चंद्रके बारेमे !!अरे हमारी करुणता तो यह है की आकाश में कितने तारे है इसकी स्पष्ट संख्याभी पता नही है । लेकिन शो बाजी में चालक लोग केवल अंहकार और अज्ञान फेलाते रहते है । इसीलिए रिलिजियानो और पोलितिसियानोकी चुन्गालसे छूटकर वास्तविक ज्ञानकी दिशामे बढे तो शान्ति मिलती है । वेदकी विविध विभागोके देवो का लेखन ज्योतिश्शात्रमे इसी प्रकार है इसे उपयोगमे लेनेसे फल्काथान्मे अच्छा रहता है।